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धातु क्या है?इसके गुणधर्म

धातु क्या है?

सभी प्रकार की वस्तुओं का निर्माण धातुओं से किया जाता है। धातुएँ दूसरे तत्वों के साथ मिलकर यौगिक (compound) बनाती हैं तथा प्रकृति में धातुओं के यौगिक अयस्क के रूप में मिलते हैं। अयस्क से धातुओं को प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रक्रियाएं (process) जैसे – निष्कर्षण , परिष्करण आदि करनी पड़ती हैं, जिससे अशुद्धियाँ व धातु अलग – अलग हो जाती हैं। इस समय लगभग सभी इंजीनियरिंग उद्योगों में धातुओं metals) का उपयोग किया जाता है। प्रत्येक धातु के अपने-अपने गुणधर्म (properties) होते हैं जिससे उनकी प्रकृति का पता चलता है।

धातुओं के भौतिक गुणधर्म

किसी धातु के वह गुण, जो बिना धातु (metal) को नष्ट किए मात्र छूनेे से अथवा देखने से ज्ञात किए जा सकते हैं, धातुओं के भौतिक गुण कहलाते हैं। धातुओं के यह गुण स्थायी होते हैं। इनको बदला नहीं जा सकता है। दूसरे शब्दों में धातओं के प्राकृतिक गुण ही भौतिक गुण कहलाते हैं। यह निम्न प्रकार से हैं-

(i)रंग

प्रत्येक धातु अपना एक विशिष्ट रंग रखती है । इस रंग के कारण ही इसे आसानी से पहचाना जा सकता है ; जैसे – पीले की धातु पीतल हो सकती है, जबकि लाल रंग की धातु ताँबा आदि।

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(ii)संरचना

प्रत्येक धातु की संरचना (structure) अलग-अलग होती है। धातु के टूटे टुकड़े को देखकर ही उसकी संरचना की पहचान कर सकते हैं। कुछ धातुएँ जैसे – पिटवाँ लोहे , एल्यूमीनियम में कणों की रेखीय गति व कुछ धातु ; जैसे – ढलवाँ लोहे , काँसे में कणों की टेढ़ी गति होती है।

(iii)भार/विशिष्ट गुरुत्व

पृथ्वी (Earth) का गुरुत्वाकर्षण बल प्रत्येक वस्तु को उसके (पृथ्वी के) केन्द्र की ओर खींचता है। अतः जिस बल से पृथ्वी किसी वस्तु को अपने केन्द्र की ओर खींचती है, उसे वस्तु का भार कहते हैं।
नोट:- पारे के अतिरिक्त अन्य सभी धातुएँ ठोस (solid metals) होती हैं क्योंकि पारा , द्रव अवस्था में प्राप्त पाया जाता है।

(iv)आपेक्षिक घनत्व

किसी दी गई वस्तु के घनत्व से पानी के घनत्व का अनुपात, आपेक्षिक घनत्व (relative density) कहलाता है।

(v)घनत्व

प्रत्येक धातु का एक निश्चित घनत्व (density) होता है । किसी भी पदार्थ का घनत्व, उस पदार्थ के द्रव्यमान के समानुपाती तथा उसके द्वारा घेरी गई जगह अथवा आयतन के व्युत्क्रमानुपाती होता है। ज्यादा घनत्व वाली धातुएँ जैसे- सीसा, सोना (gold) आदि होती हैं, तथा कम घनत्व वालीधातुएँ जैसे- एल्युमीनियम, सिलिकॉन आदि होती हैं।

(vi)चुम्बकत्व

धातुओं का वह गुण, जिसके कारण वह चुम्बक की ओर आकर्षित होती हैं, चुम्बकत्व (magnetism) कहलाता है। यह गुण लौह धातुओं में पाया जाता है।

(vii)गलनीयता

प्रत्येक धातु एक निश्चित तापमान (temperature) पर पिघल जाती है, यह तापमान उस धातु का गलनांक कहलाता है। प्रत्येक धातु का गलनांक (melting point) अलग-अलग होता है।

(viii)चालकता

धातुओं का वह गुण, जिसके कारण वह ऊष्मा तथा विद्युत को अपने अन्दर एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाने देती हैं, चालकता (conductivity) कहलाता है।
सभी धातुएँ ऊष्मा तथा विद्युत (electric) की सुचालक होती हैं। चालकता गुण के कारण ही धातु की छड़ के एक सिरे को गर्म करने पर कुछ समय बाद छड़ का दूसरा सिरा भी गर्म हो जाता है, जबकि अधातु छड़ (nonmetal rod) के सिरे को गर्म करने पर उसका दूसरा सिरा गर्म नहीं हो पाता है। अर्थात् धातु ऊष्मा व विद्युत की सुचालक होती है, जबकि अधातु ऊष्मा व विद्युत की कुचालक (insulater) होती है।

(ix)अपारदर्शक

सभी धातुओं में अपारदर्शीयता (opacity) का गुण पाया जाता है। अर्थात् धातुओं के आर-पार नहीं देखा जा सकता है।

धातुओं के यान्त्रिक गुणधर्म

विभिन्न प्रकार के बलों के प्रभाव में धातु की प्रतिक्रिया को दर्शाने वाले गुण यान्त्रिक गुण (mechanical properties) कहलाते हैं। यह निम्न प्रकार हैं-

(i)कठोरता

जिस गुण के कारण धातुएँ घिसने, कटने व खुरचने का विरोध करती है, वह गुण कठोरता (hardness) कहलाता है। कुछ धातुएँ मुलायम होती हैं, जिन्हे आसानी से खुरचा जा सकता है, जैसे- टिन व लैड आदि। तथा कुछ धातुएँ (some metals) अधिक कठोर होती हैं, जिन्हे आसानी से काटा या खुरचा नहीं जा सकता जैसे- इस्पात या टाइटेनियम आदि।

(ii)भंगुरता

जिस गुण के कारण धातुएँ चोट लगने पर टुकड़े-टुकड़े हो जाती हैं, वह गुण भंगुरता (brittleness) कहलाता है। जैसे- काँच, ढलवाँ लोहा व सिलिकॉन आदि पर चोट लगाई जाए, तो इनके टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं।

(iii)तन्यता

जिस गुण के कारण धातुओं को खींचकर तार बनाए जा सकते हैं, वह गुण तन्यता कहलाता है। लगभग सभी धातुओं के तार बनाए जा सकते हैं, जैसे- लोहा, पीतल, एल्युमीनियम, ताँबा, सोना, चाँदी तथा प्लेटिनम आदि।
जिस धातु का तार (wire) जितना अधिक पतला बनाया जा सकता है, वह धातु उतनी ही अधिक तन्य कहलाती है।
नोट- यह गुण सोना (gold), चाँदी तथा प्लेटिनम में अधिक पाया जाता है।

(iv)चिम्मड़ता

जिस गुण के कारण धातुएँ आघात को सहन करती हैं तथा मोड़ने, तोड़ने या मरोड़ने पर आसानी से टूटती नहीं हैं, वह गुण चिम्मड़ता (toughness) कहलाता है। कुछ चिम्मड़ धातुएँ जैसे- टंग्स्टन, ताँबा, सोना आदि हैं।
यह गुण भंगुरता (brittleness) के विपरीत होता है। छेनी चिम्मड़पन के गुण के कारण ही हथौड़े द्वारा आघात लगने पर कार्यखण्ड में धँस जाती है। अतः यह आघात को सरलतापूर्वक सहन कर लेती है।

(v)प्रत्यास्थता

जब किसी धातु पर बल (force) लगाया जाता है, तो उसके आकार में परिवर्तन आ जाता है परन्तु जब बल हटाया जाता है तो वह अपना पूर्व आकार प्राप्त कर लेती है। इसी गुण को प्रत्यास्थता (elasticity) कहते हैं। इसी गुण को उपयोग में लाकर धातुओं के स्प्रिंग बनाए जाते हैं।

(vi)सुघटयता

धातुओं में प्रत्यास्थता (elasticity) का गुण एक सीमा तक रहता है। यदि इस सीमा से अधिक विरूपित किया जाए, तो बल हटाने पर भी धातुएँ अपनी पूर्व अवस्था प्राप्त नहीं करती हैं तथा हमेशा के लिए अपने बदले आकार को अपना लेती हैं।
धातुओं के इसी गुण को सुघटयता या प्लास्टिसिटी कहते हैं। इसी गुण के कारण हम धातुओं की चादरों (sheets) को विभिन्न प्रकार के बर्तनों में बदलते हैं।

(vii)आघातवर्धनीयता

जिस गुण के कारण धातुएँ चोट पड़ने पर या रोलिंग करने पर फैलती हैं, वह गुण आघातवर्धनीयता (malleability) कहलाता है। इसी गुण का उपयोग कर धातु केबलेट को चादर में बदला जा सकता है। सोना (gold) सबसे अधिक आघातवर्धनीय होता है।

(viii)दृढ़ता

जिस गुण के कारण धातुएँ खींछने व दबाव पड़ने पर टूटती नहीं हैं, वह गुण दृढ़ता (tenacity) कहलाता है।

(ix)प्रभाव प्रतिरोध

धातु का वह गुण, जो धातु पर अचानक चोट लगने से उसे टूटने से बचाता है, प्रभाव प्रतिरोध (impact resistance) कहलाता है।

(x)मशीनता

धातुओं का वह गुण, जिसके कारण जॉब के छोटे भाग को काटकर अलग करने में कम बल की आवश्यकता होती है, मशीनता (machineability) कहलाता है। जो धातुएँ भंगुर होती हैं, उन्हें मशीन करने में कम बल (force) की आवश्यकता होती है, तथा तन्य धातुओं को मशीन करने या काटने में अधिक बल की आवश्यकता होती है। अतः भंगुर धातुओं की मशीनता अधिक होती है।

(xi)थकान प्रतिरोध

धातुओं का वह गुण, जो उसे लगातार झटकों के लगने के कारण अंतिम शक्ति तक टूटने से बचाता है, थकान प्रतिरोध (fatigue resistance) कहलाता है। यह गुण ग्रे कास्ट आयरन में होता है।

(xii)संपीडयता

किसी धातु का वह गुण, जिसके कारण धातु एक निश्चित सीमा तक दाब-बल लगाने पर दबती है, परन्तु फटती नहीं, संपीडयता (compressibility) कहलाता है। धातु की लम्बाई में दाब-बल लगाने से उसकी चौड़ाई में वृद्धि होती है और चौड़ाई या मोटाई (width) में दाब-बल लगाने से उसकी लम्बाई में वृद्धि होती है।

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