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सोल्डरिंग क्या है? तथा इसके प्रकार

सोल्डरिंग क्या है?

“दो या दो से अधिक धातु के पार्ट्स को सोल्डर के माध्यम से जोड़ने की क्रिया सोल्डरिंग (soldering) कहलाती है।”

यह एक प्रकार का कच्चा जोड़ होता है, जोकि कम्पन ( vibration ) होने पर खुल जाता है तथा अधिक लोड सहन नहीं कर पाता है। इसे नर्म टाँका लगाया जाना भी कहते हैं। सोल्डरिंग में गलनांक बढ़ाने के लिए एण्टीमनी तथा गलनांक घटाने के लिए बिस्मथ का प्रयोग किया जाता है। और सोल्डर का गलनांक 450°C से कम रहता है।

सोल्डरिंग के महत्त्वपूर्ण बिन्दु

  1. सोल्डरिंग प्रक्रिया (soldering process) में उपयोग किए जाने वाले सोल्डर का गलनांक जोड़े जाने वाली धातुओं के गलनांक से कम होना चाहिए।
  2. सोल्डर (solder) द्वारा लगाया गया जोड़ मजबूत होना चाहिए।
  3. सोल्डर, धातु (metal) की सतह पर आसानी से फैलने वाला होना चाहिए।
  4. जोड़े जाने वाली धातुएँ (metals), एक – दूसरे से अच्छी प्रकार जुड़ जानी चाहिए।

सोल्डरिंग प्रक्रिया

यह निम्न प्रकार से पूरी की जाती है-

1.सोल्डरिंग आयरन को गर्म करना

सोल्डरिंग करने के लिए सबसे पहले सोल्डरिंग आयरन (soldering iron) को गर्म करना आवश्यक होता है। इसके लिए ब्लो लैम्प, ब्लो टार्च या गैस फ्लेम का उपयोग किया जाता है। और सोल्डरिंग आयरन की बिट को केवल उतना ही गर्म (hot) करना चाहिए, जिससे कि सोल्डर आसानी से पिघल सके।

2.टिनिंग

“सोल्डरिंग आयरन के बिट को गर्म करने के बाद टिप पर सोल्डर की परत चढ़ाना टिनिंग (tinning) कहलाता है।” टिनिंग करने से पहले इसकी की बिट को रेती से साफ किया जाता है। और बिट को साफ (clean) करने के बाद बिट को गर्म करके उस पर नौसादर रगड़कर सोल्डर की परत चढ़ा दी जाती है।

3.टेकिंग

सोल्डरिंग प्रक्रिया शुरू करने से पहले जोड़ पर टेकिंग (tacking) प्रक्रिया की जाती है। टेकिंग पहले सेन्टर में तथा फिर किनारों पर की जाती है, जिससे कि जोड़े जाने वाले भागों का अलाइनमेण्ट बना रहे।

4.फ्लोटिंग

इसमें जॉब के जोड़ की अन्दरूनी व बाहरी (internal and outer) सतह पर फ्लक्स लगाकर जॉब को लकड़ी के ब्लॉक पर 45° के कोण पर पकड़ा जाता है। इसके बाद सोल्डर के टुकड़ों को जोड़ पर रखकर उन्हें सोल्डरिंग आयरन (soldering iron) द्वारा पिघलाया जाता है।

सोल्डरिंग की विधियाँ

सोल्डरिंग प्रक्रिया को ताप (temperature) देने की विधि के अनुसार, निम्न प्रकार से बाँटा गया है-

  1. सोल्डरिंग आयरन विधि
  2. सोल्डरिंग टॉर्च विधि
  3. डिप एण्ड वेव विधि
  4. रेजिस्टेन्स विधि
  5. इण्डक्शन विधि
  6. फर्नेश एण्ड हॉट प्लेट विधि
  7. स्प्रे विधि
  8. अल्ट्रासोनिक विधि
  9. कण्डेन्सेशन विधि

ऊपर दी गई विधियों (methods) में से सिर्फ दो ही विधियाँ अधिक प्रचलित हैं, जिनके बारे में नीचे वर्णन किया है-

1.सोल्डरिंग आयरन विधि

यह सबसे पुरानी विधि है। इसमें एक सोल्डरिंग आयरन का प्रयोग (use) किया जाता है, जिसकी टिप कॉपर की बनी होती है। इसको गर्म करने के लिए बिजली, तेल, कोक या अन्य कोई गैस प्रयोग (use) की जाती है। वैसे तो आजकल बिजली वाले सोल्डरिंग आयरन अधिक प्रयोग होते हैं। यह दो प्रकार के होते हैं-

(i)बाहर से गर्म होने वाले

इस प्रकार के सोल्डरिंग आयरन भट्ठी, ब्लो लैम्प या गैस बर्नर द्वारा गर्म किए जाते हैं। यह बिट के वजन के आधार पर बाजार में 250 ग्राम से 1 किग्रा तक के वजन (weight) में मिलते हैं। अधिक वजन का सोल्डरिंग आयरन अधिक ताप एकत्र कर सकता है तथा इसलिए अधिक समय तक काम कर सकता है।

(ii)अन्दर से गर्म होने वाले

इस प्रकार के सोल्डरिंग आयरन बिजली (electric) द्वारा गर्म किए जाते हैं। इनका लाभ यह होता है कि यह लगातार गर्मी दे सकते हैं। सोल्डरिंग करते समय भी यह गर्म होते रहते हैं। क्योंकि इनमें एक बिजली का एलीमेण्ट बिट को लगातार गर्मी देता रहता है। और soldering करने से पहले सोल्डरिंग आयरन की बिट को थोड़ा गर्म करके रेती या ईंट द्वारा रगड़कर ऊपरी सतह (surface) पर बनी हुई ऑक्साइड की परत हटा दी जाती है। इसके बाद सोल्डरिंग आयरन की बिट पर नौसादर तथा रेजिन के फ्लक्स की एक मोटी परत (layer) चढ़ा दी जाती है। सोल्डरिंग आयरन पर फ्लक्स लगाने के बाद निम्न प्रकार से प्रक्रिया पूरी की जाती है-

  1. सबसे पहले soldering की जाने वाली सतहों पर से तेल, ग्रीस तथा ऑक्साइड आदि को साफ कर लिया जाता है।
  2. इसके बाद उचित प्रकार के फ्लक्स (flux) को चुन करके जोड़ने वाली सतहों पर लगा दिया जाता है।
  3. इसके बाद जोड़ के अनुसार उचित साइज के soldering आयरन को चुन करके उसे उचित तापमान तक गर्म किया जाता है।
  4. गर्म soldering आयरन को फ्लक्स लगी सतह के सम्पर्क में लाकर उसे गर्म किया जाता है।
  5. अब soldering आयरन की नोंक ( toe ) पर सोल्डर लगाकर उसे जोड़ के साथ – साथ चलाया जाता है। सोल्डर करने की गति जोड़ की गहराई के अनुसार ही रखी जाती है, जिससे कि सोल्डर पिघलकर आसानी से जोड़ में गहराई तक जा सके। और soldering आयरन को हटा लेने से सोल्डर ठण्डा होकर जोड़ बनाता है। ठण्डा होने के दौरान जोड़ को हिलाना नहीं चाहिए, इससे सोल्डर में दरारें ( fractures ) पड़ने की सम्भावना बनी रहती है।
  6. Soldering के बाद कोरोसिव फ्लक्स को हटाया जाता है, जिससे कि सतहों को जंग ( corrosion ) से बचाया जा सकें।
  7. सोल्डर को कभी – कभी अस्थायी जोड़ (temporary joint) लगाने के लिए प्रयोग किया जाता है। यदि दो प्लेटों को आपस में जोड़ना हो तो पहले उन्हें गम करके पूरी सतह पर (फ्लक्स (flux) आदि प्रयोग करते हुए) सोल्डर लगा देते हैं।

इसके बाद उन्हें एक – दूसरे पर रखकर बाहर से पतली प्लेट को गर्मी तथा दबाव (pressure) पहुंचाते हैं। इससे सोल्डर पिघलकर जोड़ बना देता है। इस प्रकार सोल्डर के पिघलकर जोड़ बनाने की प्रक्रिया स्वीटिंग ( sweating ) कहलाती है।

2.सोल्डरिंग टॉर्च विधि

इस विधि का उपयोग बहुत बड़े व भारी जॉब का सोल्डर करने, बिजली की सप्लाई के लिए तारों में लग्स ( lugs ) लगाने तथा जेनरेटर आदि के कम्यूटेटर के कनैक्शन बनाने के लिए किया जाता है।
इस विधि द्वारा soldering करने के लिए गैस टॉर्च द्वारा ऊष्मा प्राप्त की जा सकती है। और टॉर्च के द्वारा जॉब को बहुत तेजी से गर्म किया जा सकता है। ऑक्सी – एसीटिलीन फ्लेम के अतिरिक्त अन्य कम ताप वाली फ्लेम; जैसे — ब्यूटेन, प्रोपेन आदि भी soldering करने के लिए प्रयोग की जा सकती हैं।

More Information:- सोल्डर फ्लक्स के बारे में

My Website:- iticourse.com

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