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विद्युत धारा का रासायनिक प्रभाव

विद्युत अपघटन के अनुप्रयोग

नमस्कार दोस्तों आज के इस लेख में हम आपको बताने वाले हैं विद्युत अपघट्य के अनुप्रयोग कौन-कौन से हैं तो अगर आप विद्युत अपघटन के अनुप्रयोग जानना चाहते हैं तो इस लेख को पूरा जरूर पढ़ें इस वेबसाइट (iticourse.com) के माध्यम से हम किसी तरह की जानकारी को देते रहते हैं तो चलिए शुरू करते हैं।

विद्युत अपघटन के अनुप्रयोग निम्न हैं-

अतः किसी तत्व का विद्युत रासायनिक तुल्यांक इस तत्व के द्रव्यमान (mass of the element) के बराबर होता है , जो उस तत्व के इलैक्ट्रोलाइट में एम्पियर की विद्युत धारा के प्रवाह से 1 सैकण्ड में मुक्त होता है। इसका मात्रक किग्रा / कूलाम होता है ।

अतः z = परमाणु भार ( Atomic Weight ) / संयोजकता ( Valency )

विद्युत धारा का रासायनिक प्रभाव
विद्युत धारा का रासायनिक प्रभाव

विद्युत अपघटन का अर्थ?

विद्युत अपघटन जिसे गैल्वेनिक आइसोलेशन (galvanic isolation) भी कहा जाता है वह एक डिजाइन तकनीक होती है जो अन्य धाराओं को खत्म करने के लिए विद्युत सर्किट को पृथक करती है।

किसी भी विद्युत अपघट्य (electrolyte) में जब विलायक में विद्युत धारा आरोपित करते है तो इलेक्ट्रोड पर पदार्थ जमा होते है यह प्रक्रिया विधुत अपघटन कहलाती हैं।

1) धातुओं को शुद्ध करना ( Purification of Metal )-

अशुद्ध या मिश्रित धातुओं को विद्युत अपघटन के द्वारा शुद्ध किया जाता है। इस विधि में मिश्रित धातु (mixed metal) को एनोड के रूप में तथा कैथोड को शुद्ध धातु की पतली स्ट्रिप के रूप में लिया जाता है। इसमें मिश्रित धातु का लवण ( Salt ) के साथ विलयन बनाया जाता है। जब इस विलयन में धारा प्रवाहित की जाती है तब शुद्ध धातु कैथोड पर जमा हो जाती है तथा अशुद्धि एनोड पर जमा हो जाती है।

2) संधारित्र का निर्माण ( Manufacturing of Capacitor )-

उच्च धारिता के संधारित्र ( कैपेसिटर ) (high capacitance capacitor) बनाने हेतु इलैक्ट्रोलाइसिस (electrolysis) ( विद्युत अपघटन के द्वारा संधारित्र में दो प्लेटों के मध्य विद्युत परत तैयार की जाती है । इस तरह के संधारित्र ( कैपेसिटर ) इलैक्ट्रोलाइटिक कहलाते है।

3) इलैक्ट्रोप्लेटिंग ( Electroplating )-

यह विधि व्यवहारिक तौर पर सस्ती व लोकप्रिय है। इस विधि द्वारा महंगी धातुओं की बारीक परत सस्ती धातुओं पर चढ़ायी जाती है।

कई प्रकार की वस्तुओं पर सोना, चांदी, निकिल, क्रोमियम की परत (Gold, Silver, Nickel, Chromium Flake) चढ़ायी जाती है। चांदी पर सोने की, लोहे पर ताम्बे की, लोहे पर निकिल की परत चढ़ाकर बर्फिंग करके उन्हें चमकीला बनाया जाता है। विद्युत इस्त्री का बेस कवर लोहे का होता है, उस पर निकिल की इलैक्ट्रोलाइसिस विधि से परत चढ़ाकर बाद में पॉलिश की जाती है। ताम्बे के बर्तनों व पीतल के बर्तनों को इसी प्रकार चमकाया जाता है । इमरशियन रॉड पर क्रोमियम की परत चढ़ायी जाती है

इलैक्ट्रोप्लेटिंग प्रक्रिया ( Electroplating Process )

इलैक्ट्रोप्लेटिंग प्रक्रिया निम्न प्रकार है

  1. वड वस्तु जिस पर इलैक्ट्रोप्लेटिंग करनी है को अच्छी तरह से साफ करते हैं क्योंकि इसकी सतहों पर चिकनाई व गन्दगी नहीं होनी चाहिए ।
  2. इस वस्तु को ऋणात्मक ( – ) इलेक्ट्रॉड के रूप में तार से बांधकर इलैक्ट्रोलाइट में डुबोते हैं
  3. जिस धातु की परत चढ़ानी हो उसी धातु के अनुकूल लवण से इलैक्ट्रोलाइट तैयार करते हैं।
  4. जिस धातु की परत , वस्तु पर चढ़ानी हो उसे एनोड ( धनात्मक ( + ) ) इलेक्ट्रॉड बनाया जाता है।
  5. इलैक्ट्रोलाइट में चित्रानुसार डी.सी. शन्ट जेनरेटर द्वारा सप्लाई देते हैं यदि जेनरेटर उपलब्ध नहीं हो तो रेक्टीकायर से DC देते हैं।

इससे इलैक्ट्रोलाइट में से धातु के धनात्मक ( + ) आयन विमुक्त होकर वस्तु ( कैथोड ) पर जम जाते हैं। ऋणात्मक ( – ) आयन धातु से रासायनिक क्रिया करके धातु के लवण बनाते हैं। फैराडे के प्रथम नियम ( m = zit ) के अनुसार जितनी मोटी परत चढ़ानी हो उतनी धारा उतने समय तक गुजारते हैं । इसमें कम एम्पियर की धारा गुजारनी चाहिए , इसके पश्चात् इलैक्ट्रोप्लेट की गयी वस्तु की पॉलिश व बर्फिंग करवाते हैं।

4) इलैक्ट्रोटाइपिंग ( Electrotyping )-

यह विधि मुख्य रूप से पुस्तक की छपाई हेतु काम में ली जाती है । पुस्तक का पूर्ण पृष्ठ तैयार करके साधारण विधि से पूरे पृष्ठ की लिखावट को कम्पोज (compose) कर लिया जाता है फिर प्लास्टर ऑफ पेरिस से उसकी छाप ( Print ) ली जाती है। इस छाप पर ग्रेफाइट का चूर्ण या बारीक पाउडर छिड़क दिया जाता है जिससे इसकी सतह चालक बन जाती है फिर इसे कॉपर सल्फेट ( नीला थोथा ) से धोकर इस पर लोहे का बारीक चूर्ण छिड़कते हैं।

इसमें लोहा इलैक्ट्रोलाइट के ताम्बे को अलग करके पुस्तक के छापे पर पतली परत बना देता है अब इसे कॉपर सल्फेट के इलैक्ट्रोलाइट में कैथोड ( – ) इलेक्ट्रॉड (cathode electrode) बना कर लटका देते हैं । इसमें एनोड ( + ) इलेक्ट्रॉड ताम्बे की बनायी जाती है। डी.सी. (एकदिश धारा या Direct current) सप्लाई देकर ताम्बे की काफी मोटी परत 1 घण्टे में जमायी जा सकती है।

ताम्बे की इस परत को मोम या प्लास्टर ऑफ पेरिस की छाप से पृथक् कर लिया जाता है। इसके उपरान्त ताम्बे के इस प्रकार बने टाइप को सीसे ( लैड ) को पिघला कर पीछे की ओर बनाया जाता है व छपाई मशीन ( प्रिंटिंग प्रेस ) पर चढ़ाकर पुस्तक को छापा जाता है।

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