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ऊष्मा उपचार व स्टील की संरचना

ऊष्मा उपचार क्या है?

“वह विधि जिसकी सहायता से धातुओं की आन्तरिक संरचना (internal structure) में परिवर्तन करके यान्त्रिक गुणों में परिवर्तित किया जाता है, ऊष्मा उपचार विधि कहलाती है।”
धातुओं के यान्त्रिक गुणों (machanical qualities) को बदलने के लिए धातुओं को भिन्न-भिन्न तापमानों पर गर्म व ठण्डा किया जाता है। स्टील या धातुओं में आवश्यक गुण उत्पन्न करने के लिए ऊष्मा उपचार करते हैं।

ऊष्मा उपचार के उद्देश्य

  1. धातुओं के ग्रेन साइज में सुधार करना।
  2. धातुओं की कठोरता या सामर्थ्य को बढ़ाना।
  3. धातुओं पर ठण्डी अवस्था में कार्य करने, फोर्जिंग (forging) करने, वैल्डिंग (welding) करने या ढलाई करने के कारण आए धातुओं के आन्तरिक प्रतिबल को दूर करना।
  4. धातुओं की मशीनिंग बढ़ाना।
  5. स्टील में मार्टेनसाइट (martensite) के गोल व छोटे ग्रेन बनाना।
  6. धातुओं के यान्त्रिक गुणों में सुधार करना।

एक ऐसी धातु जिसको ठण्डा या गर्म करने पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता है। वह धातु शुद्ध आयरन (wrought iron) या कच्चा लोहा है। यह एक तन्य व मुलायम धातु है। इसमें कार्बन की मात्रा 0.5% होती है। यदि इसमें कार्बन की मात्रा 0.5% से अधिक कर दी जाए। उसके बाद इसको एक विशेष तापमान पर गर्म करने व तेजी से ठण्डा करने पर कठोरता गुण आ जाता है।

स्टील की संरचना

स्टील लोहे व कार्बन के मिश्रण से बनायी गयी धातु है। जिसमें कार्बन की मात्रा कम-से-कम 0.15% तथा अधिक-से-अधिक 1.7% होती है। और स्टील में आवश्यकता के अनुसार यान्त्रिक गुण पाने के लिए ऊष्मा उपचार किया जाता है।
एक महत्तवपूर्ण बात यह है कि ऊष्मा उपचार (heat treatment) करते समय धातु के आन्तरिक कणों में होने वाले परिवर्तन या बदलाव को केवल माइक्रोस्कोप के द्वारा ही देख सकते हैं।

स्टील की संरचना के प्रकार

Structure of steel

स्टील की संरचना (structure) का वर्णन, स्टील की आन्तरिक संरचना पर ही किया जाता है। जो निम्न प्रकार है-

1.फैराइट

स्टील की यह संरचना सबसे अधिक मुलायम होती है। इसमें कार्बन की मात्रा 0.008% से 0.025% तक होती है। और इसकी या फैराइट की आन्तरिक संरचना रवेदार होती है। और इसमें चुम्बक का गुण भी पाया जाता है।

2.सीमेन्टाइट

यह संरचना सबसे अधिक कठोर व भंगुर होती है। और इस संरचना की तनन सामर्थ्य बहुत कम लगभग 350 किग्रा/वर्ग सेमी होती है। इसमें कार्बन की प्रतिशत मात्रा अन्य संरचनाओं से अधिक होती है। और कार्बन(carbon), आयरन (iron) के साथ रासायनिक रूप में मिलकर सीमेन्टाइट बनाता है। सीमेन्टाइट का रासायनिक नाम आयरन कार्बाइड है।

3.पिअरलाइट/यूटेक्टोइड स्टील

सीमेन्टाइट, फैराइट के साथ मिलकर पिअरलाइट (pearlite) बनाता है। हम जैसे-जैसे आयरन में कार्बन की मात्रा बढ़ाते हैं, तो उसमें पिअरलाइट की मात्रा बढ़ती जाती है और फैराइट की मात्रा कम होती जाती है। जब कार्बन की मात्रा लगभग 0.80% से 0.83% हो जाती है, तब इस समय स्टील में 100% पिअरलाइट होता है।

पिअरलाइट/यूटेक्टोइड स्टील के प्रकार

यूटेक्टोइड स्टील निम्न प्रकार की होती हैं-

(i)हाइपर-यूटेक्टोइड स्टील

यह सीमेन्टाइट व पिअरलाइट का मिश्रण होता है। इसमें कार्बन की मात्रा 1.8% से 2.1% होती है।

(ii)हाइपो-यूटेक्टोइड स्टील

यह पिअरलाइट व फैराइट का मिश्रण होता है। और इसमें कार्बन की मात्रा 0.8% होती है।

4.ऑस्टेनाइट

जब स्टील को उच्च क्रिटिकल तापमान (high critical temperature) पर गर्म किया जाता है, तब ऑस्टेनाइट प्राप्त होता है। यह कठोर संरचना होती है, लेकिन भंगुर नहीं होती है। इस संरचना की स्टील में चुम्बकत्व समाप्त हो जाता है।

5.मार्टेनसाइट

यदि स्टील को ऑस्टेनाइट अवस्था से ठण्डा करने की दर बहुत अधिक बढ़ा दी जाए, तो स्टील अपनी मूल अवस्था में न आकर एक नए पदार्थ में बदल जाता है, जिसे मार्टेनसाइट (martensite) कहते हैं। मार्टेनसाइट एक कठोर पदार्थ होता है, जिसके कारण स्टील में कठोरता का गुण विकसित होता है।

6.ट्रूस्टाइट

यदि मार्टेनसाइट संरचना को 400°C पर गर्म किया जाए, तो एक अधिक कठोर संरचना प्राप्त होती है, जिसे ट्रूस्टाइट कहा जाता है। इस संरचना वाली स्टील में कम्पन सहन करने की क्षमता होती है, परन्तु इस पर मशीनिंग कार्य (machining work) सरलतापूर्वक नहीं किए जा सकते हैं।

7.सॉरबाइट

स्टील को लगभग 700°C पर गर्म करने के बाद टैम्परिंग करके ठण्डा करने पर जो संरचना प्राप्त होती है। उसे सॉरबाइट कहा जाता है। इसमें फैराइट तथा सीमेन्टाइट होता है।

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