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ब्रेजिंग क्या है? इसकी विधि

ब्रेजिंग क्या है?

“दो एकसमान व अलग-अलग धातुओं पर कठोर जोड़ लगान की विधि ब्रेजिंग (brazing) कहलाती है।”
इस प्रक्रिया को हार्ड सोल्डरिंग (hard soldering) भी कहा जाता है, यह सोल्डरिंग के विपरीत होती है, क्योंकि इसमें कहीं पर भीे सोल्डरिंग आयरन की जरूरत नहीं होती है।

ब्रेजिंग (brazing) का उपयोग कटिंग टूल्स पर कार्बाइड टिप लगाने, नल फिटिंग आदि जोड़ने के लिए, कास्ट आयरन की मरम्मत के लिए, रेडिएटर आदि के लिए किया जाता है। ब्रेजिंग में जोड़ (joint) लगाने के लिए स्पैल्टर या सिल्वर का प्रयोग किया जाता है। इसके द्वारा लगाए गए जोड़ अपेक्षा अधिक मजबूत होते हैं।

ब्रेजिंग अलॉय

“ब्रेजिंग करने के लिए उपयोग होने वाली फिलर धातु को स्पैेल्टर या ब्रेजिंग अलॉय (brazing alloy) कहते हैं।”
इसमें भी अलग-अलग प्रकार की धातुओं को जोड़ने के लिए अलग – अलग प्रकार के ब्रेजिंग अलॉय या फिलर धातु प्रयोग (use) की जाती है।

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ब्रेजिंग अलॉय के प्रकार

यह मुख्य रूप से दो प्रकार (two types) के होते हैं, जोकि निम्न प्रकार से हैं-

1.स्पैल्टर

यह अलॉय ताँबा और जस्ता (zinc) के मिश्रण से बनाया जाता है। इसके द्वारा ताँबा, पीतल, लोहा, जस्ता या जिंक, स्टील आदि धातुएँ जोड़ी जाती हैं ।
ताँबे तथा चाँदी जैसी धातुओं (metals) को आपस में जोड़ने के लिए स्पैल्टर का गलनांक 600°C से 850°C तक होता है।
ताँबे तथा जिंक को आपस में जोड़ने के लिए स्पैल्टर का गलनांक (melting point) 650°C से 950°C तक होता है।
चाँदी व जिंक को आपस में जोड़ने के लिए स्पैल्टर का गलनांक 688°C से 750°C होता है।

2.सिल्वर स्पैल्टर

यह अलॉय ताँबा और चाँदी या चाँदी और जिंक के मिश्रण से बनाया जाता है। इसमें फ्लक्स के रूप में सुहागा (borax) प्रयोग किया जाता है। इसमें ताँबा, जस्ता तथा चाँदी का प्रतिशत मात्रा क्रमश : 50 %, 30 % तथा 20 % तक होती है।

ब्रेजिंग अलॉय के गुण

एक अच्छे ब्रेजिंग अलॉय (brazing alloy) में निम्न गुण होने चाहिए।

  1. यह बेस मैटल की सतह (surface) पर आसानी से फैलने योग्य होना चाहिए।
  2. यह केशिकात्व (capillary action) के द्वारा आसानी से जोड़ों में भरने योग्य नहीं होना चाहिए।
  3. इसका गलनांक (melting point) बेस मैटल के गलनांक से काफी कम होना चाहिए, यदि इसका गलनांक अधिक होगा, तो ब्रेजिंग के समय बेस धातु की सतह खराब हो सकती है।
  4. अलॉयों में जोड़ के यान्त्रिक गुण जैसे – टेन्साइल स्ट्रेन्थ (tensile strength), तन्यता (ductility) आदि होने चाहिए।

बेजिंग की प्रक्रिया

इसमें भी सोल्डरिंग (soldering) के समान ही सबसे पहले ब्रेजिंग की जाने वाली सतहों की सफाई की जाती है। इन सतहों को साफ करने के लिए कुछ ब्रेजिंग फ्लक्स प्रयोग में किए जाते हैं। और यह फ्लक्स फिलर धातु के गलनांक (melting point) से कम तापमान पर – ही पिघलकर पूरी सतह पर फैल जाते हैं। और इसमें फ्लक्स के रूप में अधिकतर सुहागा ( borax ) प्रयोग किया जाता है। 60°C या अधिक ताप के लिए सोडियम, पोटैशियम या लीथियम बोरेट प्रयोग (use) किए जाते हैं। तथा ऑक्साइड को हटाने के लिए सोडियम, पोटैशियम तथा लीथियम के फ्लोराइड्स प्रयोग किए जाते हैं। ब्रेजिंग क्रिया के समय ऑक्साइड बनने से रोकने के लिए अनेकों प्रकार के कृत्रिम वायुमण्डल तैयार करके उसके अन्दर वैल्डिंग की जाती है। इसके बाद निम्न से शेष प्रक्रिया (process) पूरी की जाती है-

  1. ब्रेज धातु के छोटे – छोटे टुकड़े, जोड़ के साइज के आकार के काटकर, सुहागा (borax) लगाकर इस प्रकार रखे जाते हैं, जिससे कि यह (छोटे टुकड़े) गर्म होने पर पिघलकर जोड़ के चारों ओर फैल जाएँ।
  2. जोड़ को सही स्थिति में रखकर फिक्स्चर (fixture), क्लैम्प या अनील्ड वायर के द्वारा कसकर बाँध देते हैं।
  3. इसकेे बाद ब्लो लैम्प या वैल्डिंग टॉर्च के द्वारा जोड़ को तब तक गर्म (hot) करते हैं, जब तक स्पैल्टर पिघलकर जोड़ में न चला जाए।
  4. इसके बाद गर्म जॉब को पानी में ब्रेजिंग (brazing) के तुरन्त बाद धोकर फ्लक्स को हटा देते हैं।

ब्रेजिंग की विधियाँ

जॉब को गर्म करने के आधार पर ब्रेजिंग (brazing) की विधियाँ (methods) निम्न प्रकार हैं-

1.ब्लो पाइप ब्रेजिंग

इसमें ब्रेज (braze) करने वाली वस्तु को एक चारकोल के टुकड़े पर रखकर जोड़ के ऊपर फ्लक्स लगाकर फिलर धातु का टुकड़ा रख दिया जाता है। इसके बाद एक लैम्प या मोमबत्ती (candle) की ज्वाला को ब्लो पाइप और मुँह की सहायता से जोड़ पर फेंका जाता है। इससे फिलर धातु पिघलकर जोड़ में भर जाती है या ठण्डी होने पर मजबूत जोड़ बनाती है। यह विधि (method) विशेष रूप से स्वर्णकारों द्वारा सोने – चाँदी के गहनों को ब्रेज करने के लिए प्रयोग की जाती है।

2.भट्ठी ब्रेजिंग

इसमें फिलर धातु (metal) के छोटे – छोटे टुकड़ों को जोड़े जाने वाले भागों के बीच में रखकर सही स्थिति में बाँध दिया जाता है । इसके बाद जॉब को ऑक्सीडेशन से बचाने के लिए भट्ठी का वायुमण्डल भी नियन्त्रित (control) किया जाता है।
इसके बाद गर्म होने पर फिलर धातु पिघलकर जोड़ की पूरी सतह पर केशिकात्व (capillary action) के द्वारा फैल जाती है तथा ठण्डी होकर एक मजबूत जोड़ बनाती है। भट्ठी ब्रेजिंग में पूरे जॉब ही गर्म किया जाता है, जिससे जोड़ के बाद ठण्डा होने पर आन्तरिक प्रतिबल ( internal stress ) कम – से – कम बनते हैं। इस विधि का उपयोग बहुत बड़े जॉब (जैसे- 1 से 1.5 किग्रा) को अधिक संख्या में ब्रेजिंग करने के लिए किया जाता है।

3.टॉर्च ब्रेजिंग

यह विधि सबसे अधिक प्रचलित है। इस विधि के द्वारा फैब्रिकेशन तथा मरम्मत दोनों ही प्रकार के कार्य सभी कारखानों में किए जाते हैं। इसमें ऊष्मा का स्रोत एक वैल्डिंग टॉर्च द्वारा (by torch) एसीटिलीन गैस और हवा के मिश्रण को जलाकर ज्वाला के रूप में प्राप्त किया जाता है।
नॉन – फैरस धातुओं जैसे – एल्यूमीनियम (aluminium) आदि की ब्रेजिंग करने के लिए ऑक्सी – हाइड्रोजन टॉर्च का भी प्रयोग किया जा सकता है। इसमें जोड़ को गर्म करके ब्रेजिंग छड़ को फ्लक्स (flux) के साथ ही पिघलाया जाता है।

4.निर्वात ब्रेजिंग

यह एक प्रकार की फर्नेस ब्रेजिंग प्रक्रिया (process) है, इसमें धातु का आक्सीकरण होने से बचाने के लिए वायुमण्डल को नियन्त्रित करने के स्थान पर निर्वात उत्पन्न किया जाता है। जिससे कि निर्वात उत्पन्न होने से धातु का ऑक्सीकरण (oxidation) नहीं हो पाता है।

5.इण्डक्शन ब्रेजिंग

इस विधि का उपयोग (use) वहाँ किया जाता है, जहाँ पर उत्पादन दर (production rate) बहुत अधिक हो तथा पार्ट्स को बहुत अधिक तेजी से गर्म करने की आवश्यकता हो। और इसमें यह किया जाता है कि सबसे पहले ब्रेज किए जाने वाले भागों (parts) को एक इण्डक्शन क्वॉयल के अन्दर रखा जाता है। इसके बाद इन क्वॉयल में से उच्च आवृत्ति (high frequency) का करण्ट गुजारा जाता है। इससे इण्डक्शन द्वारा भागों को ऊर्जा मिलती है जिसके कारण पूरा जॉब बहुत कम समय में ही गर्म हो जाता है। इसकी गर्मी से फिलर धातु पिघलकर जोड़ों में पेनीट्रेट (penetrate) करती है और ठण्डी होने पर मजबूत जोड़ बनाती है।

6.डिप ब्रेजिंग

इस विधि (method) में ब्रेज करने वाले पार्ट्स में सबसे पहले ही फ्लक्स लगा दिया जाता है। फिर इसके बाद इन पार्ट्स को पिघली हुई फिलर धातु के रासायनिक बाथ में डुबोया जाता है, जिससे पार्ट गर्म (hot) हो जाता है और फिलर धातु जोड़ में पहुँच जाती है, जोकि ठण्डी होने पर मजबूत जोड़ बनाती है।

7.सिल्वर ब्रेजिंग

इस विधि में फिलर धातु के रूप में सिल्वर मिश्र धातु का प्रयोग किया जाता है। सिल्वर मिश्र धातु में सिल्वर तथा अन्य धातुएँ जैसे – कॉपर, जिंक व कैडमियम की अलग-अलग प्रतिशत मात्रा होती है। इसमें सिल्वर 40% से 60% तक होती है। सिल्वर मिश्र धातु को जब 600 – 850°C पर गर्म किया जाता है, तो यह पिघलकर धातु जोड़ (metal joint) में पहुँच जाती है तथा ठण्डी होकर मजबूत जोड़ बनाती है।

More Information:- सोल्डरिंग क्या है? इसकी विधि के बारे में

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